गुरुवार, 31 मई 2018

लौ


दीये की लौ नहीं
मोम पिघलता
रौशनी से पागल करता
लगातार जलता
थोड़ा मचलता
सब झूमकर आते
कुछ छूने की चाह में
मदहोस बिखर जाते
कुछ मँडराते
कुछ बुझाने की तरक़ीब में
धधक जाते
स्थिर स्तब्ध
दंभ आह
मौजूद होने से
खोने की ओर
वक़्त से बेपरवाह
मौजूद थोड़ी सी
उन जमे हुए
बिखरे
अंत के आरंभ में।

© raj

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

जो प्यार


शब्दों को मार डाला
पर कविता नहीं मरती ,
प्यार से कभी डरती
जो प्यार ज़िस्म से करती।

ढूंढा भी नहीं
मुनासिब भी नहीं लगती
उस नुक्कड़ से तो गुजरती
जो प्यार ज़िस्म से करती।

समझा दिया है दिल को
आहटों का अब आसरा नहीं रखती
दो लफ़्ज तो जुबां से उतरती
जो प्यार ज़िस्म से करती।

दिल को जो नागवार गुजरता
तक़ल्लुफ़ से संवरती 
गुमसुम रहा करती
जो प्यार ज़िस्म से करती।

दिल चाहता कुछ और था
दुनियाँ कुछ और ही कही 
छुप के यूँ मुकरती
जो प्यार ज़िस्म से करती।

तोड़ने का हुनर भी है खूब
दर्द बहुत देर में जो पहुँची
कुछ देर यहाँ और ठहरती
जो प्यार ज़िस्म से करती।

© raj

मंगलवार, 27 मार्च 2018

मेरी तितली (17.03.18)


हर सुबह
अपने कोमल
स्पर्श से जगाती है,
जब वो पास होती है
फूलों की महक और
चिड़ियों की चहक
मन के थके शिराओं में
एक ऊर्जा एक प्राण
भर देती है ,
कभी माँ सी
महसूस होती है
जब माथे पे
हाथ रखकर पूछती है
तबियत कैसी है,
जब दौड़कर
मेरे कंधे पे
झूलती है
तो अंदर सोया बचपन
जाग जाता है
मन अबोध आनंद से
प्रफुल्लित हो उठता है ,
जब डांट खा कर
चुपचाप रोती है
तो दिल पिघलकर
दर्द सा जम जाता है ,
जब नाराज़ होती है
तो सिर्फ मुझे चाहती है
करीब जाने पर मुझे
डांटती है
आख़िर में मेरे सीने से
लिपट जाती है ,
उसका स्पर्श
उस क्षण को
जीवन को
सुभाषित कर देता है
मुस्कान उसकी
दर्द में राहत और
आँसुओं में मुस्कराहट
बिखेर देती है।

©raj

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

खोना नहीं है


मैं थोड़ी जल्दीबाज़ी में था
पर किसी दोस्त ने अविराम
ठहरने को कहा
उसकी बातों ने
मेरी बेचैनी शांत कर दी ,
अपने पिछले कदमों को
देखने लगा
अपनी अगली कदमों को
समझने लगा ,
माँजने लगा एहसासों को
पिरोने लगा वक़्त में
बुनने लगा भूत को
सच के रेशमी सूत को
सँवरने लगी साँस मेरी
निखरने लगी आश मेरी ,
खिंचा एक बार ख़ुद को
देखा फिर अपने वजूद को
जो चाह है है वो यही तो
राह फिर बिखरी नहीं तो ,
मंज़िल की रौशनी
धुंधले भी हैं
और पहुंचने के पहले
कई रास्ते भी हैं
किसी और रंगीनियों में
भटकना नहीं है
बिखरना नहीं है ,
आँसुओं को अब
खुशियों के लिये
बचा रक्खी है
अफ़सोस के ज़हर में
सिसकना नहीं है ,
चकाचौंध है
मंज़िल की बस्ती
घर अपना सुकूं का
ढूँढना है उसी में
फिसलना नहीं है
चमकते पंकिलों में
वरना खुद को ढूँढकर
मिलोगे
एक हस्ती भी रहेगी और
तरसती भी रहेगी
भीतर से बाहर
बरसती भी रहेगी ,
सो होना है जो भी
खोना नहीं है
होने से पहले और
हासिल भी होकर
खुद से दूर
कभी होना नहीं है।

©raj

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

ज़िन्दगी गिरवी है


ज़िन्दगी गिरवी है
और मुझे जीना है
ज़िंदगी गुजरने से पहले ,
ख्वाइशें बेबस है
और पुरी होनी है
वक़्त बिगड़ने से पहले ,
ख्वाब अधूरे हैं
बस नींद मुक़म्मल हो
नज़रें धुँधलाने से पहले ,
मंज़िल बैचेन है 
रास्ते तय करने हैं
ख़ामोशी पसरने से पहले।
ज़िंदगी गिरवी है
और मुझे जीना है
ज़िंदगी गुजरने से पहले।

© raj

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

ज़िंदगी के केनवस पर


ज़िंदगी के केनवस पर इरेज़र 
हर जगह काम नहीं आते हैं 
कुछ गलतियों को मिटा नहीं पाते 
कुछ दर्द भूला नहीं पाते 
कुछ ज़ख़्म सुख कर भी 
भीतर रिसते हैं 
कुछ बातें अरसा गुजर गया 
पर अचानक उभर आते हैं 
यादें उम्र गुजरने के बाद भी 
फिर से जवां नजर आते हैं 
गुजरे लम्हों की नादानी 
वर्तमान की टीस हो जाते हैं 
एहसासों के समंदर में 
ख़्वाबों के बुलबुले 
ज़िंदगी की नाव को 
टाइटैनिक बना देते हैं ,
ज़िंदगी के केनवस पर इरेज़र 
हर जगह काम नहीं आते हैं।  

©raj

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

छूट गया


पत्थर सा जम गया दर्द था
क्यों शोले से दिल धधक गया फिर ,
जो हल्की हल्की पिघल रही थी
क्यों सैलाब से सरहद बिखर गया फिर।

एक चढ़ता सूरज खिलने से पहले
क्यों रूठ गया क्यों छूट गया ,
सपनों से अपने मिलने से पहले
क्यों आसमान से टूट गया।

आश में थी जो अब तक साँसें
क्यों बदहवास हुई है रातों रात ,
विश्वास दिखाकर लूट गया क्यों
उम्मीद संग जीवन हाथों हाथ।

वक़्त दिया राह दिखायी
छिना रौशनी आँगन का ,
रौशन था उससे कितना जीवन
है राख़ हुआ उस उपवन का !

©raj

बुधवार, 10 जनवरी 2018

तुम्हें ख्याल है

तुम्हें ख्याल है
इस ख्याल से खुश हूँ ,
अचानक आवाज जो दी
इतने वर्षों की धूल
ग़ुबार की तरह फैला
इस धुंधले सवाल से खुश हूँ।
तुम्हें ख़्याल है ...

देखने की जरुरत ही नहीं
आवाज जहन को छू लेती है
देखता तो आया हूँ वर्षों
देखने के मलाल से खुश हूँ।
तुम्हें ख़्याल है ...

बेअसर हो रहा था
बाअसर हो रहा है
छेड़ दी है हल्की जो एक धुन
इस आगाज़--ताल से खुश हूँ।
तुम्हें ख़्याल है ...

सोंचा था
जो बदलेगी सूरत
यूँ बदली हो सबकुछ
कि सूरत--हाल से खुश हूँ।
तुम्हें ख़्याल है ...

कुछ यूँ ही बनाये रखना
नजदीकियाँ दिलों में
रम जाना ग़ुम जाना
बस यूँ ही फ़िलहाल से खुश हूँ।
तुम्हें ख़्याल है ,
इस ख्याल से खुश हूँ।


© raj