सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

दर्द

दर्द वो नहीं
जो बातों से
मुलाकातों से
चेहरे से या
आँखों से
झलकता है
दर्द तो वो ग़हरा है
जो सिवाय ख़ुद के
किसी ओर को
एहसास तक नहीं होता!

काश! खुशियों की तरह
दर्द बाँटा जा सकता
समझा जा सकता 
महसूस किया जा सकता
हर किसी से और
किसी से भी
बेझिझक बयां किया जा सकता
तो फिर ये भी वैसे ही
ग़ायब हो जाया करती
चंद लम्हों में ,

क्यों?
ये बँटता नहीं
छँटता नहीं
हटता नहीं
घुलता जाता है
आने वाले पलों से
जीने वाले लम्हों से
हँसने वाले वजहों से ,
मिलता जाता है
चेहरे के रंगों से
होठों से
साँसों से
बातों से
और एक दिन खुद को
दर्द की शीशी में बंद सा
घुटता हुआ महसूस करता है।


© raj

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

अल्फ़ाज़ों से छुआ

यूँ मुँह फेरकर बैठी हो
ज्यों तुम्हारे साथ
बड़ा धोखा हो गया,
अजी मोहब्बत भी नहीं हुई
ख़ामोशियों का ये कैसा
सिलसिला हो गया ,
निग़ाह भर देखने की
अभी तो ख्वाईश की थी
सोंचने भर से रुख़सार पे
ये कैसा पर्दा हो गया ,
तमन्नाओं ने तो अभी
दो कदम रक्खे थे
यूँ थक कर रुक गए
जैसे हसरतों का
काफ़िला हो गया ,
निगाहों से नहीं
अदाओं से नहीं
अल्फ़ाज़ों से छुआ
तो आईना हो गया ,
ख़ामोशियाँ देखिये
सब कहने लगी हैं
लफ़्जों की हिफ़ाजत
सब ज़ाया हो गया ,
नजरों को अब थोड़ा
समझा भी लीजिये
झुकी जो रही ये 
तो समझिये हामी भरने का
क़ायदा हो गया ,
समझ भी गई जो
नजरें तुम्हारी
धड़कनों की आहट
कानों में बजेगी
दिल के खुश रखने का
ये रास्ता हो गया।


© raj

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

दो-राहे

दो-राहे निकल आते हैं
जब भी कदम दिल की बातों में
बढ़ने को जाते हैं
आम राहों की तरह नहीं
गलत और सही की राह, बल्कि
एक दिल और दूजी दुनियाँ का रास्ता
चुनना बहुत ही सुखद है आसान है
पर चलना उस जंग-ए-सिपाही की तरह है
जिसे जंग के बिच घर जाने की
स्वीकृति मिल तो जाती है
दिल चाहता भी है घर जाना
पर कर्तव्य हीनता के अपराध बोध से
पाँव उठते नहीं गड़ते जाते हैं ,
ऐसे ही कुछ मानसिक दबाब -
कुछ फिक्रमंद लोगों के लिये
दुःख पहुचने के डर से
खो देने के डर से
दिल की हरकतों को
बचकाना बताकर -
व्यवहारिक होने को
मज़बूर कर देते हैं ,
बंदिशें खींचती है पीछे -
अगर पटरी से उतरे
कहीं और मुड़े या रुके
तो ट्रैन की तरह कुचल जाओगे
सब ख़त्म हो जायेगा ,
जो भी एक बार आरंभ है
वो अंत से ही बदलेगा ,
कुछ यूँ महसूस होता है तब
अब आरंभ को बदलना
मुमक़िन नहीं !
पर कुछ ऐसी उम्मीदें हैं
जो अपूर्ण मरती नहीं
उम्र और अवरोधों से डरती नहीं
परिस्थितियों के तूफ़ान से
बिखरती नहीं
तकलीफ़ों से कराहती नहीं
तन्हाइयों से घबराती नहीं
वक़्त और दायरे के शिकंजे में आती नहीं
यहाँ तक की मौत भी जिसे मार पाती नहीं
ज़मीन में दबे उस बीज़ की तरह है
जो मुद्दतों दबे रहने के बावज़ूद
दम नहीं तोड़ती
तलाश नहीं छोड़ती
विश्वास नहीं छोड़ती बल्कि
सुराख़ ढूँढती रहती है
अपने अंदर संजोये तमाम
एहसासों को साँसें देने के लिये
संभावनाओं को उजागर करने के लिये
अपने वज़ूद को सार्थक करने के लिये
दुनियाँ को खुद से रुबरु कराने के लिये।

चित्र साभार गुगुल -
© raj

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

हिंदी दिवस (१४ सितंबर)

हिंदी तुम्हारी तबियत तो ठीक है
देखो हम तुम्हारे दिवस पे शरीक़ हैं ,
तुम्हें बचपन से जानता सुनता आ रहा हूँ
तभी तो जलसे में आज तुम्हें गा रहा हूँ ,
तुम मेरे अपने हो तुम्हारे लिए कुछ नए कपड़े लाये हैं
और ये चंद डॉलर हैं वक़्त की कमी से एक्सचेंज न हो पाये हैं ,
तुम भी कहाँ अब तक घुसी बैठी हो थोड़ी तहज़ीब बदल लो
अपने इतिहास से निकल कर थोड़ी भूगोल पर चल लो ,
कुछ शौक़ीन लोग ही आते हैं यहाँ स्वाद बदलने स्वादिष्ट खाने को
वो इंटलेक्चुअल हैं देखते नहीं उधर; जो समझ आये सारे ज़माने को ,
क्या करूँ समझाने हर बार आता हूँ
और हैरान हूँ तुम्हारे ही शब्दों के अनुवाद से छा जाता हूँ ,
ख़ैर अब चलता हूँ अपना ख़्याल रखना
डायरी पन्नों ही में सही दिल को सम्हाल रखना।

©raj

शनिवार, 9 सितंबर 2017

माँ

तुम्हारे लड़खड़ाते थरथराते शब्द
जब कानों से सीने तक पहुँचती है
दिल दहल जाता है,
तुम्हारे काँपते हाथ
बड़ी तकलीफ़ से उठते हुए
जब माथे को छूती है
भावनायें हिलौरें मारने लगती हैं ,
गर्त में डूबी तुम्हारी आँखें
छल छल करते हुए
मुझे देखकर जब
बरसने को होती हैं
उस दर्द से मेरा -
वज़ूद पिघलने लगता है,
तुम्हारे कलमियों की सफ़ेदी
कब तुम्हें अपनी गिरफ़्त में लेकर
झुर्रियों के बिच बिठा दिया समझ न पाया ,
अब तुम्हारे चेहरे के लकीरों में
अपना बचपन देखता हूँ
तुम्हारी आँखें तुम्हारी मुस्कुराहट
ललचायी हुई मेरी ओर देखती हैं
तब तूफ़ान आ जाता है अंदर
डबडबा जातीं हैं कोर
तुम्हारा ही तो हिस्सा हूँ
फिर इतना अलग इतना फ़र्क!
सामर्थ्य पर रंज होता है अपने
तुम्हें, मुझ- सा संजोये न रख सका
वो ममता वो मरहम
वो चिंता वो चुंबन
तुम्हें लौटा न सका
मेरी रक्षक तुम्हारी तेज़ आँखें
उसे धुंधलाने से भी बचा न सका
इस कर्ज़ के बोझ से माँ
बस बैठ जाता हूँ कभी कभी
निःशब्द रोने लगता हूँ
बरसने देता हूँ तुम्हारे प्रेम को
सिसकियाँ बंधने लगती हैं
काँपते होठों को दबा देता हूँ
तुम्हारे ही दिये वो मोती सी दांतों से ,
अब भी तुम्हारा ही साथ ढूंढता हूँ
जब बुख़ार से तपता हूँ
जब दर्द से कराहता हूँ
जब शुन्य का एहसास होता है
जब अधूरेपन का ज़ख्म -
दर्द की सीमाओं को छूता है ,
फिर सोंचता हूँ कितना निष्ठुर; नकारा हूँ
तुमने भी कोई वादे न लिये
मैंने भी खुद को मज़बूर न किया
स्वार्थी तुम भी थी मेरे लिये
मैं भी किसी और के लिए हो गया
पर सच कहूं तुम्हारे बग़ैर सर्वस्व हारा हूँ ,
ये दूरियों का दंश
जो तुम्हारी आँखों में झिलमिलाती है
ये मिलने की आश
जो हर सुबह की तरह
मन में उग आती है
मैं भी उसी टीस से गुज़रता हूँ,
अपने दर्द को दबा कर
दुआयें बरसाती हो
मेरी खुशियों के ख़ातिर
खुद को सकुशल बताती हो
इतना ही नहीं तुम्हारे बिना जी सकूँ
मुझे साहसी और समझदार बताती हो
मैं ख़ूब समझता हूँ
पर मन को समझा नहीं सकता माँ ,
मैं बस तुमसे माफ़ी मांगता हूँ
अपने तमाम गलतियों की
अपराधों की जो हमेशा बोध होता है
अन्याय तुमसे दूर रहने का
और उन सब आसुंओं के लिये
जिसकी वज़ह मैं हूँ ,
बस मुझे रोने देना माँ
जब भी मेरा मन भर आये
शायद जीने के लिये ये जरुरी हो !
 ©raj

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

आशाओं की कतरन

सलाद सजा रखी है शब्दों की
आशाओं की कतरन से
बस आप नमक छिड़कते जाइये
ज़ायका ख़ुद ब ख़ुद बढ़ता जायेगा ,
आग में जलता हूँ पुरे बरस
की कब वो मौसम आयेगा जब
इस हाल में जीने का सुंकू आता है ,
ज़ख्म के सूखने की अब उम्मीद छोड़ दी है
जब भी कोई मरहम रखता है
ज़ख्म की चीख़ निकल जाती है ,
ज़ख्म से रिश्ते ग़हरे हो गए
तो क़सूरवार भला किसे ठहरायें
खुशियाँ ग़लत समझती हैं मुझे
अब किसे कैसे समझायें ,
आसमान का सुकून तो है सर पे
पर बाजुओं का जुनून भी अखरता है
चीरने को फड़फड़ाते है जब डेने
बेबाक़ बेहिसाब वो बरसता है ,
आज़ाद किसी रेगिस्तान में
रेंगते हुए रेत पर
न पेड़ न पानी न पंक्षी न फूल
दूर तक निगाहों में धूल और
इसके सीने में कैक्टस के शूल ,
आँखों पे पट्टी बाँधे जैसे भाग रहा हूँ
सपने कहीं सीमाओं से घिरे होते हैं
ठोकरों से लहुलूहान तन मन प्राण
चुपचाप सरकते आसुंओं से जागता हूँ !

©raj

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ख़्वाबों के लिये

भाई चाल बदल डाली है
शांति में अपनी ख़लल डाली है,
(तकलीफ़ आप तक भी जायेगी थोड़ी बहुत)
पर क्या करूँ ज़िंदगी तो यों ही है
थोड़ी भरी थोड़ी खाली है।

चाहता हूँ कुछ और
मांगता हूँ कुछ और,
पकड़ता हूँ एक छोर
चोटी मिलती है कोई और।

ये ताल मेल अंदर की सब गड़बड़ी है
धड़कनों में कुछ और जुबां पे कुछ और चढ़ी है,
होंठ हँसते हैं थिरकते हैं 
आँखों के कोर सैलाब खड़ी है।

शब्द होते नहीं भाव मिलते नहीं
दर्द मिटते नहीं घाव दिखते नहीं,
सब धोख़े हैं मुस्कुराहटों के पीछे
ख़ुद्दारी के आगे कुछ और टिकते नहीं।

वक़्त की पतवार है उम्मीदों पे सवार है
सपनों की लहरों पे क़िस्मत भी दरक़ार है,
उम्र टूटती है हर लम्हा हौंसले निखरते हैं
कांपते हाथों में अनुभव की भरमार है।

ज़रूरत ज़ज़्बात ख़िदमत हालात
उभरकर सबसे जो अब तैयार है,
जीने को लम्हें ढूंढता है और देखता है
ये कैसा आख़िर है; जो आरंभ की दीवार है!

कहता है, यही करना था तो क्या करना था
क्यों फ़ुज़ूल हसरतों में डुबोये रक्खा,
हासिल क्या हुआ जब वो फूल ही खिला
उम्रभर जिसे दिल में बोये रक्खा।

किरचों में चलते रहे आँसुओं में ढलते रहे
ज़ख़्मी पैर ख्वाइशों को फ़िसलते रहे सम्हलते रहे,
मौत ही अगर पाना होता तो क्यों इतने तूफ़ानों से गुजर आना होता
हम तो अपने ख़्वाबों के लिये हर लम्हा जलते रहे पिघलते रहे!


©raj

शुक्रवार, 30 जून 2017

बुद्ध हो चला हूँ मैं !

                                                            चित्र साभार गुगुल। 
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
दुःख मुझको थामने
हरपल है पीछे सामने
अविचल मौन निहारता
अदम्य ओज ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
दर्द मुझको ताकती
ह्रदय में के झांकती
आँखें स्थिर आलोकमय
टीस में पला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
कष्ट से क्लेश से
मन मरा कभी द्वेष से
रंज में शतरंज में
मन-युद्ध में ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
अस्त्र से शस्त्र से
शासकों सा वस्त्र से
बस प्रेम में सजा धजा
शांति के रंग से -
रची हुई कला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
अहं में तरंग में
राज पाट जंग में
निर्लोभ निष्पक्ष निर्वाह में
हर साँस ही ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
आग है राग है
जन्म से वैराग है
हर राह मैंने खुद चुनी
इस ज्ञान से छला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
रूप रंग रास में
भोग मय विलास में
भव्य भवन निवास में
ऐश्वर्य सब दला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
भय भ्रम भ्रांति सब
कर्तव्य कर्म क्रांति सब
मोह मर्म माया भी
हर रोग से जला हूँ मैं!
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
प्राण हरूँ रौंदूं रक्त
खुद को ढूँढू, छोडूं तख्त
सत्य से हुआ विरक़्त
शून्य में घुला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
सदी का ख़्वाब जल रहा
विश्वास पर जला नहीं
वक़्त की ऱाख जय तिलक सा
मस्तक पे ले मला हूँ मैं। 
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
है कतार रिश्ते यार की
अपनों ही से घिरा हुआ
पर अज़नबी है हर नज़र
नगर डगर सफ़र -
सब ही में अकेला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!


©raj